बिहार के स्कूल में बदल गया किताबे – बिहार के सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले लाखों छात्रों के लिए शिक्षा विभाग ने एक ऐतिहासिक और दूरगामी फैसला लिया है। अब कक्षा 9वीं से ही विद्यार्थियों को द्विभाषिक (हिंदी–अंग्रेज़ी) पाठ्यपुस्तकें उपलब्ध कराई जाएंगी। यह निर्णय खासतौर पर उन छात्रों के लिए बेहद लाभकारी साबित होगा, जो 10वीं के बाद अचानक अंग्रेज़ी माध्यम की पढ़ाई में खुद को असहज महसूस करते हैं।
अब नौवीं से ही मिलेंगी द्विभाषिक किताबें हिंदी-अंग्रेजी में होंगे पाठ
राज्य के सरकारी स्कूलों में मैट्रिक के बाद पढ़ाई का पैटर्न पूरा बदल जाता है। 10वीं तक स्कूलों में बिहार बोर्ड की हिंदी मीडियम की किताबें पढ़ाई जाती हैं, जबकि 11वीं से प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी बेहतर कराने के लिए एनसीईआरटी का सिलेबस मिल जाता है। 10वीं में अंग्रेजी एक पेपर के रूप में है, लेकिन इसके अंक रिजल्ट में नहीं जुड़ते। इससे बच्चों की रुचि भी अंग्रेजी के प्रति नहीं होती। लेकिन, इंटरमीडिएट में खासकर गणित व विज्ञान की पढ़ाई भी अंग्रेजी में ही कराई जाती है, जिससे अधिकतर बच्चों की लय बिगड़ जाती है। समझने में ही महीने गुजर जाते हैं, तब तक कई महत्वपूर्ण चैप्टर निकल गए रहते हैं।
हाई स्कूल में पढ़ाई जाती हैं बिहार बोर्ड की हिंदी मीडियम की किताबें
अब शिक्षा विभाग 9वीं से 12वीं तक के बच्चों को द्विभाषिक किताबें देगा, जिसमें सभी पाठ हिंदी के साथ अंग्रेजी में भी होंगे। शिक्षा विभाग की ओर से बच्चों के हित बड़ा बदलाव किया जा रहा है। इससे 9वीं कक्षा से ही बच्चे महत्वपूर्ण टॉपिक्स को हिंदी के साथ अंग्रेजी में भी समझ सकेंगे। इससे उनकी आगे की राह भी आसान होगी। मैट्रिक उत्तीर्ण कर इंटरमीडिएट में जाने पर सिलेबस समझने में ज्यादा कठिनाई नहीं होगी और वे आसानी से प्रतियोगी परीक्षाओं की भी तैयारी कर सकेंगे।
सरकारी स्कूलों की लाइब्रेरी में रहेंगी किताबें, तैयार हो रहे 12 लाख 23 हजार सेट
विभाग की ओर से सरकारी स्कूलों की लाइब्रेरी में द्विभाषिक किताबें उपलब्ध कराई जाएंगी। बच्चे इसका लाभ निशुल्क ले सकेंगे। इसके लिए 12 लाख 23 हजार 864 सेट तैयार किया जा रहा है, जिसमें 88 लाख 73 हजार 14 किताबें होंगी। विभाग की ओर से बताया गया है कि 10 मार्च 2026 तक प्रकाशन का काम पूरा हो जाएगा। यानी अगले सत्र में लाइब्रेरी में किताबें उपलब्ध करा दी जाएंगी।
इंटरमीडिएट के साथ प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में भी पिछड़ जाते थे बच्चे
बिहार के बच्चों के साथ उच्च शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं में भाषा सबसे बड़ी बाधा रहती है। खासकर सरकारी स्कूलों से निकलने वाले बच्चों को पैटर्न बदलने पर परेशानी होती है। इंटरमीडिएट में सभी स्कूलों ने एनसीईआरटी की किताबें लागू कर दी है, ताकि बच्चों को दिक्कत न हो। लेकिन, अंग्रेजी के कारण मुश्किल होता था। 9वीं से द्विभाषिक किताबें उपलब्ध होने के बाद यह समस्या दूर हो जाएगी।
छात्रों को होगी बड़ी सहूलियत आसानी से समझ सकेंगे चैप्टर
11वीं-12वीं की किताबें हिंदी के साथ अंग्रेजी में भी उपलब्ध हैं। दोनों भाषा में अलग-अलग किताबें उपलब्ध हैं। छात्र अपनी सुविधा के अनुसार भाषा का चयन करते हैं। लेकिन, अभी 9-10 की किताबें केवल हिंदी में आती हैं। 9 से 12वीं तक के लिए द्विभाषिक किताब उपलब्ध होने से बड़ी राहत होगी। मैट्रिक के साथ ही इंटर के छात्रों के लिए भी। जिन बच्चों की अंग्रेजी कमजोर होगी, वे हिंदी का पाठ देखकर आसानी से चैप्टर को समझ सकेंगे। विज्ञान और गणित के छात्रों के लिए यह सरकार की बड़ी सौगात है। अगले कुछ सालों में इसका सकारात्मक परिणाम भी देखने को मिलेगा। इससे छात्रों में नवाचार भी बढ़ेगा।
अब तक क्या थी समस्या?
10वीं के बाद अचानक बदल जाता था माध्यम कक्षा 10वीं तक पढ़ाई पूरी तरह हिंदी माध्यम में होती थी। अंग्रेज़ी सिर्फ एक विषय के रूप में पढ़ाई जाती थी, जिसके अंक कई बार कुल परिणाम में निर्णायक नहीं होते थे। 11वीं में पहुंचते ही गणित, भौतिकी, रसायन और जीवविज्ञान जैसे विषय अंग्रेज़ी में पढ़ाए जाने लगते थे।
छात्रों की समझ पर पड़ता था असर अंग्रेज़ी शब्दावली और टर्मिनोलॉजी समझने में कई महीने लग जाते थे। तब तक सिलेबस के कई महत्वपूर्ण चैप्टर निकल चुके होते थे। इसका सीधा असर बोर्ड परीक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी पर पड़ता था।
वर्तमान व्यवस्था (अब तक क्या चल रहा था)
माध्यम और सिलेबस में बड़ा अंतर
- कक्षा 9 और 10 तक
- अधिकांश सरकारी और निजी स्कूलों में हिंदी माध्यम की पाठ्यपुस्तकें लागू रहती थीं।
- अधिकांश विषय (गणित, विज्ञान, इतिहास, भूगोल आदि) पूरी तरह हिंदी में पढ़ाए जाते थे।
- 10वीं में अंग्रेज़ी एक विषय के रूप में होता है, लेकिन दूसरे विषयों की पढाई अंग्रेज़ी में नहीं होती।
- कक्षा 11 और 12
- 11वीं में प्रवेश होते ही एनसीईआरटी (NCERT) आधारित अंग्रेज़ी पाठ्यक्रम लागू हो जाता है।
- अंग्रेज़ी माध्यम में गणित, भौतिकी, रसायन, जीवविज्ञान जैसे विषय पढ़ने पड़ते हैं।
- इससे होता यह है कि 10वीं के बाद अचानक माध्यम पूरी तरह बदल जाता है, जिससे छात्रों की समझ में गिरावट आती है।
भाषा को लेकर कठिनाई
- 9–10 की तक हिंदी में पढ़ाई के कारण अंग्रेज़ी शब्दावली और तकनीकि शब्दों से छात्र परिचित नहीं रहते।
- 11वीं में आते ही छात्रों को नई भाषा के कारण विषय समझने में कठिनाई होती है।
- इसका परिणाम यह होता है कि:
- पढाई समझने में समय ज्यादा लगता है।
- सीधा बोर्ड परीक्षा में प्रभाव दिखता है।
- प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी प्रभावित होती है।
प्रतियोगी परीक्षाओं में दिक्कत
- सभी प्रतियोगी परीक्षाओं का माध्यम अधिकांशतः अंग्रेज़ी है।
- सरकारी स्कूलों के छात्र अंग्रेज़ी भाषा की वजह से शुरुआत में ही पीछे रह जाते हैं।
- इससे उनका आत्मविश्वास और प्रदर्शन दोनों प्रभावित होते हैं।
भविष्य में नई व्यवस्था (अब क्या नया आएगा)
शिक्षा विभाग ने 9वीं से 12वीं तक द्विभाषिक (हिंदी–अंग्रेज़ी) किताबें उपलब्ध कराने का निर्णय लिया है। इसका मतलब यह है कि
द्विभाषिक पाठ्यपुस्तकें
- हर मुख्य विषय—गणित, विज्ञान, सामाजिक विज्ञान आदि के पाठ हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों में उपलब्ध होंगे।
- विद्यार्थियों को एक ही किताब में दो भाषाओं के साथ-साथ अनुक्रम में समझने का अवसर मिलेगा।
भाषा के स्तर पर सहजता
- कठिन अंग्रेज़ी शब्दों का अर्थ छात्रों को सीधे हिंदी से समझाने का अवसर मिलेगा।
- हिंदी भाषा का सहारा लेते हुए छात्र अंग्रेज़ी शब्दावली पर भी पकड़ मजबूत करेंगे।
- इससे विषयों का अर्थ और कॉन्सेप्ट दोनों बेहतर रूप से समझा जा सकेगा।
प्रतियोगी परीक्षा तैयारी में सहायता
- छात्र पहले से ही अंग्रेज़ी शब्दावली और भाषा शैली से परिचित होंगे।
- यह तैयारियों के शुरुआत से ही प्रतियोगी परीक्षाओं के अनुरूप शिक्षण व्यवस्था देगा।
- प्रतियोगी परीक्षाओं में अंग्रेज़ी भाषा के कारण होने वाली बाधा कम होगी।
शिक्षण–अध्यापन की गुणवत्ता में सुधार
- शिक्षक को अब द्विभाषिक पुस्तक से पढ़ाते हुए छात्रों की भाषाई कठिनाइयों को सीधे मेटाने का अवसर मिलेगा।
- इससे कक्षा में पढ़ाई का स्तर, समझ और प्रदर्शन बेहतर होगा।
इसका छात्रों पर वास्तविक प्रभाव
- छात्र गहन रूप से विषय को समझ पाएंगे क्योंकि हिंदी में अर्थ तुरंत समझकर अंग्रेज़ी शब्द सीखा जा सकेगा।
- कठिन विषय जैसे भौतिकी, रसायन, गणित इत्यादि अब आसानी से ग्रहण होंगे।
- पहले 10वीं के बाद ‘अचानक परिवर्तन’ के कारण छात्र बाहरी भाषा के दबाव में गिरते थे।
- अब 9वीं से ही अंग्रेज़ी भाषा और टर्मिनोलॉजी का परिचय मिलने से यह झटका समाप्त होगा।
- छात्र प्रारंभ ही अंग्रेज़ी टर्म्स और प्रश्न शैली से परिचित हो जाएंगे, जिससे उनकी तैयारी मजबूत होगी।
- अंग्रेज़ी भाषा की भनक पहले से होने से परीक्षा को लेकर आत्मविश्वास बढ़ेगा।
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