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मकर संक्रांति पर स्नान ध्यान दान का महत्व- ऐसे करें पूजा होगी सभी मनोकामना पूरी

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By arcarrierpoint

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मकर संक्रांति पर स्नान ध्यान दान का महत्व- ऐसे करें पूजा होगी सभी मनोकामना पूरी

मकर संक्रांति पर स्नान ध्यान दान का महत्व- ऐसे करें पूजा होगी सभी मनोकामना पूरी:-मकर संक्रांति हिंदू पंचांग का एक अत्यंत शुभ पर्व है, जो हर वर्ष 14 जनवरी के आसपास सूर्य के मकर राशि में प्रवेश के साथ मनाया जाता है। यह पर्व केवल ऋतु परिवर्तन का संकेत नहीं, बल्कि आध्यात्मिक शुद्धि, आत्मचिंतन और समाजसेवा का समन्वय है। शास्त्रों में इस दिन स्नान–ध्यान–दान को विशेष फलदायी बताया गया है। नीचे इसके महत्व, पूजा-विधि और उपयोगी उपाय विस्तार से दिए जा रहे हैं।

मकर संक्रांति एक सूर्य से जुड़ी अनेक परंपराओं का महोत्सव है। सबको सूर्य चाहिए, क्योंकि इससे जीवन की तमाम जरूरतें पूरी होती हैं। ऐसे में, आध्यात्मिक रूप से ही नहीं, व्यावहारिक रूप से भी मकर संक्रांति का महत्व बहुत बढ़ जाता है। यह महापर्व अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग ढंग से मनाया जाता है। प्रस्तुत है महिमा सामंत की कलम से इस महापर्व के विविध रूपों को समेटता आलेख…

य “ह भारतीय एकता का महोत्सव है। भारत की पहचान उसकी विविध परंपराओं में नहीं, बल्कि उन्हें जोड़ने वाली भावना में है। अलग-अलग स्वाद, अलग-अलग रीतियां और अलग-अलग उत्सव हैं, पर सूर्य एक ही है। उसका प्रकाश सबके लिए समान है। यही कारण है कि मकर संक्रांति केवल एक पर्व नहीं, बल्कि भारत की सामूहिक मुस्कान और साझा आशा है। यह ऐसा पर्व है, जो पूरे देश में प्रायः एक ही समय पर मनाया जाता है, पर इसके हर क्षेत्र में अलग-अलग रूप और रंग हैं। यह पर्व केवल परंपरा नहीं, बल्कि प्रकृति, परिश्रम और कृतज्ञता का महोत्सव है।

स्वच्छता पवित्रता का संदेश। निरोग रहने के लिए जीवन में स्नान का महत्व है। सर्दियों में कुछ लोग स्नान से बचते हैं। उन्हें वापस स्नान के लिए प्रेरित करना जरूरी है।

प्रकृति के प्रति आभार प्रदर्शन। सूर्य, खेत, कृषि औजार, कृषि में सहायक पशु, नई फसल, अनाज की पूजा दरअसल प्रकृति का ध्यान करते हुए आभार प्रदर्शन का अवसर है।

संसाधन साझा करने का संदेश। नई फसल के साथ संपन्नता आती है, पर उसका लाभ सबको समान रूप से नहीं मिलता है। समाज में जरूरतमंद लोगों के लिए दान जरूरी है।

यह प्रकृति से जुड़ा पर्व है। इस समय देश के अधिकांश क्षेत्रों में फसल कटाई हो जाती है। कृषक समाज अपनी मेहनत का फल पाकर प्रकृति व सूर्य के प्रति आभार व्यक्त करना चाहता है। यह पर्व समाज के श्रम, संतोष और साझा खुशियों को प्रकट करता है।

मकर संक्रांति के कई रूप हैं, तो कई नाम भी हैं। इसके नाम बदलते हैं, पर भावना एक ही रहती है।

यह संबंधों को मजबूत करने का पर्व है। तिल, गुड़, मूंगफली और नारियल से बने पकवान विशेष रूप से तैयार किए जाते हैं। इन्हें पड़ोसियों और मित्रों में बांटकर मधुर व्यवहार दर्शाया जाता है। आंगन में रंगीन अल्पनाएं सजती हैं। हरी पत्तियों के साथ गन्ना घरों की शोभा बढ़ाता है। इस दिन पशुओंको भी सजाया जाता है, क्योंकि कृषि उनकी मदद से ही मुमकिन होती है।

यहां यह चार दिन चलने वाला महापर्व है। मिट्टी के पात्रों में नए चावल, दूध और गुड़ से विशेष व्यंजन पकाया जाता है और वह जब उफनता है, तब उसे समृद्धि और सौभाग्य का संकेत माना जाता है। यहां पशुओं की ही नहीं, उन खेतों की भी पूजा होती है, जो कृषि को संभव बनाते हैं।

इस समय चावल की नई फसल की कटाई के बाद भगवान सूर्य और प्रकृति को धन्यवाद देने की परंपरा है। घरों में नारियल और गुड़ से बनी पारंपरिक मिठाइयां बनाई जाती हैं। लड्डू और हलवा बनता है। सभी मिलकर भोजन और प्रसाद पाते हैं।

सुबह-सुबह घरों के सामने रंगीन अल्पनाएं बनाई जाती हैं। तिल, चावल और गुड़ से बने व्यंजन पकते हैं। बच्चों के हाथों में उड़ती पतंगें उत्साह का प्रतीक बन जाती हैं।

यह पर्व तिल और गुड़ की मिठास के माध्यम से सामाजिक सौहार्द का संदेश देता है। महिलाएं पारंपरिक रीति से पर्व मनाती हैं। घरों में विशेष भोजन बनते हैं और पतंगबाजी से परिवेश में उल्लास होता है।

यह पतंगों के महासमागम का महोत्सव है। रंग-बिरंगी पतंगों से भरा आकाश स्वतंत्रता और आनंद का उत्सव बन जाता है। परिवार छतों पर एकत्र हो,व्यंजनों का आनंद लेते हैं।

यहां मकर जलाया जाता है। लोग उसके चारों ओर पंजाब और हरियाणा में यह अलाव के संक्रांति से पहले लोहड़ी के रूप में अलाव इकट्ठा होकर तिल, मूंगफली और गजक खाते हैं। लोकगीत, नृत्य, सामूहिक उल्लास इस पर्व को ऊर्जा से भर देते हैं।

इस दिन आस्था और सामाजिक सहभागिता का उत्कर्ष दिखता है। यहां नदियों में स्नान, दान-पुण्य और खिचड़ी के भोग की प्रधानता है।

यह सादगी, स्वाद और परिवार का पर्व है। इन राज्यों में मकर संक्रांति सादगी से मनाई जाती है। दही-चूड़ा, तिल से बने पकवान और पारिवारिक भोजन इस दिन को खास बनाते हैं।

इस दिन लोक परंपराओं का संगम दिखाई देता है। पश्चिम बंगाल में चावल और गुड़ से बनी मिठाइयां उत्सव के केंद्र में रहती हैं। असम (माघ बिहू) और ओडिशा में सामूहिक भोज, अलाव और लोक परंपराएं इस पर्व को सामुदायिक उत्सव बनाती हैं।

इस दिन दान-पुण्य और पतंगबाजी का विशेष महत्व है। मध्य भारत में लोक मेले और पारंपरिक गीत इस उत्सव को रंगीन बनाते हैं। पर्वतीय क्षेत्रों में यह पर्व श्रद्धा और प्रकृति के प्रति सम्मान के रूप में मनाते हैं।

केरल में स्थित शबरीमला अयप्पा स्वामी का पवित्र तीर्थक्षेत्र मंडल काल की समाप्ति के बाद मकर संक्रांति के दिन विशेष भक्ति के साथ भक्तों के लिए खोला जाता है। भक्तों की आस्था के अनुसार मकरविलक्कु को दिव्य ज्योति के रूप में पूजा जाता है। स्वामी शरणं अयप्पा के जयघोष के साथ लाखों श्रद्धालु भगवान अयप्पा के दर्शन करते हैं। 41 दिनों के व्रत, सात्विक जीवन और आत्मसंयम के माध्यम से भक्त मकर संक्रांति को केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और साधना के पावन पर्व के रूप में मनाते हैं।

  1. स्नान के बाद पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें।
  2. तांबे के लोटे में जल, लाल फूल और रोली डालकर सूर्य को अर्घ्य दें।
  3. ॐ सूर्याय नमः” का 108 बार जप करें।
  4. घर में बनी खिचड़ी/तिल-गुड़ का भोग लगाएँ।
  5. जरूरतमंदों को दान करें और बड़ों का आशीर्वाद लें।
  • सूर्य को अर्घ्य देते समय मनोकामना स्पष्ट रूप से कहें।
  • इस दिन क्रोध और अहंकार से बचें।
  • परिवार के साथ भोजन करें—सामूहिकता का पुण्य मिलता है।
  • शाम को दीपक जलाकर घर की उत्तर-पूर्व दिशा में रखें।
  • बिहार/उत्तर प्रदेश: खिचड़ी पर्व
  • पंजाब: लोहड़ी
  • तमिलनाडु: पोंगल
  • असम: भोगाली बिहू
  • पश्चिम बंगाल: गंगासागर मेला

मकर संक्रांति पर स्नान–ध्यान–दान का त्रिसूत्र अपनाने से जीवन में शुद्धता, शांति और समृद्धि आती है। विधि-विधान से पूजा, सेवा और संयम—तीनों का समावेश आपकी मनोकामनाओं को पूर्ण करने में सहायक होता है।

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यह वेबसाइट Sumit Sir के निर्देशन में संचालित है। इस बेवसाइट पर सही और सटीक जानकारी सबसे पहले उपलब्ध कराया जाता है। सुमित सर के पास पिछले पांच साल से ऑनलाइन और ऑफलाइन पढाने का अनुभव है। धन्यवाद।

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